नागपंचमी

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August 6, 2016

नागपंचमी

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नागपंचमी हमारी इसी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है, नागपंचमी नागों को समर्पित हमारे सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है।

नाग हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा है, जहां एक तरफ नाग भगवान शंकर के आभूषण के रूप में उनके गले में लिपटे रहते हैं तो वहीं शिवजी का निर्गुण-निराकार रूप शिवलिंग भी सर्पों के साथ ही सजता है।

भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर ही शयन करते हैं, शेषनाग जी भगवान विष्णुजी की सेवा से कभी विमुख नहीं होते।

जब-जब भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतार लेते हैं, तब-तब शेषनाग जी उनके साथ अवतरित होते है। रामावतार में लक्ष्मण जी तथा कृष्णावतार में बलराम जी के रूप में शेषनाग ने भी अवतार लिया था।

पवित्र श्रावण (सावन) माह के शुक्ल पक्ष में पांचवें दिन को यानि पंचमी को नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है।

मान्यता है कि श्रावण मास के शुक्लपक्ष की पंचमी नागों को आनंद देने वाली तिथि है, इसलिए इसे ‘नागपंचमी‘ के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मातृ शाप से नागलोक जलने लगा, तब नागों की दाह-पीड़ा श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन ही शांत हुई थी, इस कारण ‘नागपंचमी‘ पर्व लोकविख्यात हो गया।

सही मायने में नागपंचमी का त्यौहार हमें नागों के संरक्षण की प्रेरणा देता है।
पर्यावरण की रक्षा और वनसंपदा के संवर्धन में हर जीव-जंतु की अपनी भूमिका तथा योगदान है, फिर सर्प तो लोक आस्था में भी बसे हुए हैं।

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